बचपन के दिनों की प्यारी दोस्त के नाम एक गुमनाम खत

काफी समय तक तुम्हें देख नही पाया था और मन नही लगता था फिर स्कूल खुला और मेरा स्कूल में पहली बार मन लगने लगा. काफी समय बाद एहसास हुआ कि वह मेरा पहला क्रश था तुमसे. भूगोल के मास्टर साहब प्रश्नों के उत्तर लंबे लंबे लिखवाते और में याद करते आता क्योंकि तुमसे याद नही हो पाते सुर फिर तुमसे याद करने के तरीके मुझसे पूछती बस उसी क्लास में…

TO WHOM IT MAY CONCERN!

नाम तो मैं तुम्हारा तब भी नहीं लेता था, अब तो न मतलब बनता है और न ही कोई हक.

तुमको देखते ताकते और बतियाने का बहाना ढूंढते तीसरा साल हो चला था. बचपन की कक्षाएं जैसे जैसे बढ़ रहीं थी वैसे वैसे तुम्हारे साथ ज्यादा समय बिताने और तुम्हें बार बार देखने की ललक बढ़ती जा रही थी. 1984 का वह साल याद है जब गांव मे बाढ़ आयी थी और स्कूल काफी समय के लिए बंद हो गया था.

काफी समय तक तुम्हें देख नही पाया था और मन नही लगता था फिर स्कूल खुला और मेरा स्कूल में पहली बार मन लगने लगा. काफी समय बाद एहसास हुआ कि वह मेरा पहला क्रश था तुमसे. भूगोल के मास्टर साहब प्रश्नों के उत्तर लंबे लंबे लिखवाते और में याद करते आता क्योंकि तुमसे याद नही हो पाते सुर फिर तुमसे याद करने के तरीके मुझसे पूछती बस उसी क्लास में तुम मुझसे कुछ बातें कर लेती पर मैं कैसे याद करता इसका गवाह मुहल्ला है जिसके ज्यादतर लोगों को पता होता कि मैं इतिहास या भूगोल याद कर रहा हूं.

बड़े पिताजी तो कई बार पूछ बैठते कि क्यों भाई खाली इतिहासे-भूगोल विषय हैं क्या?
उस साल एक और छुट्टियां पड़ीं वो भी काफी लंबी इंदिरा जी हत्या जो हो गई थीं. उसके बाद मेरा एडमिशन गांव के नए मॉन्टेसरी में हुआ वो भी साल पूरा हुए बगैर.

उसके बाद फिर पढ़ाई के लिए बनारस चला गया. दो दशक से ज्यादा हो गए पर तुम्हारी बातें और यादें को फिर से गांव के एक मित्र ने ताजा कर दी. उसे पता चल गया कि मेरी नज़रें किसे ढूंढती थीं. पिछले साल उसने बिना पूछे ही तुम्हारा जिक्र किया और बताता गया तुम्हरी शादी ससुराल और आजकल तुम कहां हो? क्या कर रही हो?

मैंने उससे कहा कि पता नहीं कितनी पुरानी और किसकी बात कर रहे हो मुझे तो ठीक से याद भी नहीं. अब छोड़ो भी उसने हैरत से मेरी तरफ देखा और बोला – तो तुमने पहले क्यों नही बोला पूरी कहानी हूं-हूं करके सुनते रहे और अब बोल रहे हो कि याद नही. उसे कौन समझाए कि तुम्हारी राजी खुशी जान कर मेरा मन कितना हर्षित हुआ था.

एक बार एक मित्र से मिलने उसके कॉलेज गया तो वहीं देखा, उन दिनों दिल्ली आ गया था. तुमसे बातें करने का मन हुआ. तुम्हारे पास गया बहुत सारी लड़कियों से घिरी हुई थी तुम. वह पूरी बातचीत आज भी याद है मुझे. तुम मेरे जीवन की वो पहली हवा हो जिसका एहसास ताउम्र नहीं भुला पाऊंगा, खासकर जब भी पुरवाई गुनगुनाएगी… ईश्वर तुम्हे हमेशा खुश रखे ऐसी कामना रहेगी. आज भी तुम खुश होगी, वैसे ही खिलखिलाती होगी – पक्का यकीन है मुझे!

चेहरा तो नहीं भूली होगी तुम, मालूम नहीं तुम्हें मेरा नाम याद होगा या नहीं, इसीलिए बता देता हूं –
बब्लू
अब किसी और का…

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