योगी सरकार के निशाने पर मीडिया क्यों है?

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उत्तर प्रदेश में आखिर पत्रकारों पर केस क्यों किए जा रहे?
बता दें, उत्तर प्रदेश के बिजनौर से खबर आई कि एक समाचार छापने पर पांच पत्रकारों के खिलाफ पुलिस ने केस दर्ज किया है. दरअसल बिजनौर जिला के बसी गांव में कुछ दबंगों ने एक दलित परिवार को सरकारी नल से पानी भरने से रोका और मारपीट की. दलित परिवार द्वारा पुलिस में शिकायत के बाद भी मामला शांत नहीं हुआ. पीड़ित परिवार ने अपना मकान बिकाऊ है का पोस्टर चिपका दिया. यही खबर प्रकाशित हो गई, जो स्थानीय प्रशासन को नागवार लगी. जिसके बाद स्थानीय पांच पत्रकारों पर थाने में रिपोर्ट दर्ज कर ली गई.
दूसरी घटना बताते है पूर्वी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में पिछले शुक्रवार को एक पत्रकार को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया कि उसने एक स्कूल में बच्चों द्वारा झाड़ू लगाने की फोटो खींचकर प्रशासन को दी थी. हालांकि, खबर है कि आजमगढ़़ के डीएम ने इस घटना और पत्रकार की गिरफ्तारी के जांच के आदेश दिए हैं. इतना ही नहीं, इसी महीने पूर्वी उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिला प्रशासन ने एक पत्रकार पर इसलिए मुकदमा कर दिया कि उस पत्रकार ने एक स्कूल में मिड डे मील में बच्चों को नमक के साथ रोटी खिलाए जाने का वीडिया बना लिया था और वीडियो वायरल हो गया, जिससे प्रशासन भड़क ऊठा और पत्रकार को जबरन साजिशकर्ता बताकर कानून के शिकंजे में ले लिया.

उत्तर प्रदेश की तीनों घटनाओं में एक समानता है कि प्रदेश का स्थानीय प्रशासन चौकस है कि जो खबर प्रशासन की पोल खोले, प्रशासन और सरकार को असहज करे, उसे स्थानीय प्रशासन स्वीकार नहीं करेगा फिर चाहे खबर सच ही क्यों न हो. आखिर उत्तर प्रदेश में स्थानीय प्रशासन और पुलिस के हौसले इतने बुलंद क्यों हैं?

मीडिया पर ठीकरा फोड़ने की कोशिश क्यों?

सभी को पता है कि उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी अपराधियों को लेकर कई बार ऐसे बयान दे चुके हैं कि उत्तर प्रदेश में अपराधियों को बख्शा नहीं जाएगा और उन्हें अपराधियों को पकड़ने से ज्यादा एनकाउंटर में दिलचस्पी है. इसी कड़ी में यहां पत्रकारों को भी भय दिखाया जा रहा कि सरकारी बदइंतजामी, भ्रष्ट्राचार, दबंगई, लोगों की समस्याओं को अगर मीडिया में लाया गया तो इसकी कीमत चुकानी होगी मुकदमे के रूप में. सर्वविदित है स्थानीय प्रशासन और पुलिस सरकार के दिशा-निर्देशों का ही पालन करते हैं, क्योंकि उन्हें भी अपनी नौकरी बचानी होती है. पत्रकारों पर हुए मुकदमों से साफ जाहिर होता है कि मुख्यमंत्री योगी नें प्रदेश के आला अधिकारियों को ऐसे दिशा-निर्देश दिए हुए हैं, जहां भी स्थानीय मीडिया में सरकार की पोल खुलती नजर आए या सरकार की छवि पर असर हो, वहां पत्रकारों को सीधे-सीधे साजिश कर्ता, अपराधी बना दो. जिससे प्रदेश के ज्यादा नहीं, कुछ छोटे पत्रकारों में जेल जाने, कानूनी पचड़ों में पड़ने का भय और डर तो व्याप्त होगा ही. किसी भी घटना का कुछ लोगों या उससे जुड़े प्रोफेशन के लोगों पर निगेटिव और पोजिटिव मनोवौज्ञानिक असर होना स्वाभाविक है. क्योंकि इन घटनाओं के बाद सरकार ने स्थानीय प्रशासन और पुलिस का बचाव ही किया. पत्रकारों और मीडिया की स्वतंत्रता पर हो रहे दमनात्मक मामलों के बारे में निर्णायक रूप से कुछ नहीं कहा गया. सरकार को लचर रवैया न अपनाते हुए सुस्पष्ट करना चाहिए था, जबकि ऐसा कुछ हुआ नहीं. इससे प्रदेश की जनता खुद ही अंदाजा लगा सकती है कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार किस दिशा में जा रही है.

योगी आदित्यनाथ पर राजनीतिक दबाव तो है ही!

आपको बता दें, कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी की अगुआई में पूर्ण बहुमत से बनी योगी सरकार को ढाई साल हो गया और अब ज्यादा समय बचा नहीं है. इन 30 महीनों की योगी सरकार में उत्तर प्रदेश में लोगों को जैसी उम्मीद थी, वैसा कुछ काम हुआ नहीं है. अगर एक वर्ग को छोड़ दिया जाए, क्योंकि उसकी प्रतिबद्धता है बीजेपी में, प्रदेश के अधिकतर लोग खुश नहीं हैं. इसको विस्तार से यहां नहीं बता सकते. मुख्यमंत्री योगी कोई रिश्क नहीं लेना चाहते कि उनकी सरकारी नीतियों, व्यवस्था, शिक्षा, पानी, स्वास्थ्य, भ्रष्ट्राचार, दलित आदि पर कोई अप्रिय खबर को प्रमुखता मिले, जिससे सरकार की छवि धूमिल हो, सवाल उठें और लोगों का परसेप्शन चेंज हो. आने वाले समय में उत्तर प्रदेश में प्रशासन द्वारा अगर पत्रकारों पर और मुकदमें दर्ज होते हैं, तो हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

मीडिया भी अपनी जिम्मेदारी समझे!

अंत में कहना चाहूंगा कि कि मीडिया कैसा भी हो, कितने भी सवालों के घेरे में हो लेकिन फिर भी देश की अधिकांश जनता आज भी समस्या से दो-चार होने पर मीडिया और पत्रकारों की ओर आशा भरी नजरों से देखती हैं कि कहीं ये लोग ही उनकी आवाज को सरकार तक पहुंचा दें, तो न्याय मिल जाए. कई बार मीडिया में आई एक खबर से पीड़ित को न्याय मिलता भी है.

परंतु देश के प्रत्येक जिला के पत्रकार संगठनों को अपनी जिम्मेदारी और नैतिकता को समझना भी जरूरी है. उन्हें अपने जिले में सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई फर्जी पत्रकार न पनपने पाए और न ही लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कोई स्वार्थी पत्रकार अपनी कारगुजारियों से बदनाम करे. कहावत सभी को पता है कि एक गंदी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है. पत्रकारों को ही अपने प्रोफेशन के मान-सम्मान और प्रतिष्ठा को बचाना होगा.

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